भारत में कई ऐसे पर्यावरण प्रेमी हुए हैं जिन्होंने जंगलों को सिर्फ संरक्षण का विषय नहीं, बल्कि अपने जीवन का हिस्सा बना लिया। वन्यजीवन प्रेमी मरुति चितमपल्ली ऐसे ही एक महान व्यक्तित्व हैं जिन्होंने जंगलों के लिए जीवन समर्पित किया। उन्होंने न केवल संरक्षण कार्यों में अग्रणी भूमिका निभाई, बल्कि समाज को भी पर्यावरण के प्रति जागरूक करने का अद्भुत कार्य किया।
मरुति चितमपल्ली का प्रारंभिक जीवन
वन्यजीवन प्रेमी मरुति चितमपल्ली का जन्म महाराष्ट्र के अकोला जिले के एक छोटे से गाँव में हुआ था। बचपन से ही उन्हें प्रकृति से गहरा लगाव था। जंगलों की हरियाली, पक्षियों की आवाजें और जानवरों की गतिविधियाँ उनके जीवन का हिस्सा बन गई थीं।
उन्होंने वन सेवा में प्रवेश लेकर अपने जीवन को पर्यावरण और जैव विविधता के संरक्षण हेतु समर्पित कर दिया। उनकी शिक्षा वनस्पति विज्ञान, पक्षी-विज्ञान और वन प्रबंधन जैसे विषयों पर केंद्रित रही।
सेवा और योगदान
वन्यजीवन प्रेमी मरुति चितमपल्ली ने महाराष्ट्र वन विभाग में कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। उन्होंने मेलघाट, ताडोबा और चंद्रपुर जैसे संवेदनशील जंगल क्षेत्रों में कार्य करते हुए वहां की जैव विविधता को बचाने के लिए अनेक योजनाएं चलाईं।
उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वह सिर्फ कार्यालय तक सीमित नहीं रहे, बल्कि जमीन पर जाकर कार्य करते थे। उन्होंने आदिवासी समुदायों के साथ मिलकर जंगल संरक्षण के लिए सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा दिया।
लेखक के रूप में पहचान
वन्यजीवन प्रेमी मरुति चितमपल्ली सिर्फ वन अधिकारी ही नहीं, बल्कि एक बेहतरीन लेखक भी हैं। उन्होंने मराठी भाषा में अनेक प्रसिद्ध पुस्तकों की रचना की है जिनमें जंगलों का जीवंत चित्रण मिलता है।
उनकी प्रमुख रचनाओं में
- Ranvata
- Pranikatha
- Jungleche Raje
- Pakshikatha
इन पुस्तकों के माध्यम से उन्होंने आमजन को प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनाया।
पक्षी विशेषज्ञता और पर्यावरण शिक्षा
वन्यजीवन प्रेमी मरुति चितमपल्ली पक्षियों के व्यवहार और आवास संबंधी जानकारी के विशेषज्ञ माने जाते हैं। उन्होंने पक्षी-प्रेक्षण को ग्रामीण और शहरी बच्चों के बीच लोकप्रिय बनाया।
उनका मानना है कि “यदि आप एक बच्चे को एक पक्षी की कहानी समझा सकते हैं, तो आप उसे पर्यावरण से जोड़ सकते हैं।”
मेलघाट में सराहनीय कार्य
मेलघाट टाइगर रिजर्व में वन्यजीवन प्रेमी मरुति चितमपल्ली ने बाघों के संरक्षण के लिए ऐतिहासिक कार्य किए। उस समय क्षेत्र में अवैध शिकार और जंगल कटाई बड़ी समस्याएं थीं। उन्होंने स्थानीय आदिवासियों को संरक्षण में भागीदार बनाकर जंगल बचाने की दिशा में काम किया।
उनकी रणनीतियाँ आज भी कई राज्यों में संरक्षण मॉडल के रूप में अपनाई जाती हैं।
पुरस्कार और सम्मान
वन्यजीवन प्रेमी मरुति चितमपल्ली को उनके योगदान के लिए कई राष्ट्रीय और राज्यस्तरीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया, जिनमें शामिल हैं:
- महाराष्ट्र भूषण पुरस्कार
- साहित्यमित्र पुरस्कार
- पर्यावरण रक्षक सम्मान
- भारत सरकार द्वारा प्रशंसा पत्र
उनकी कार्यशैली और समर्पण को देखकर नई पीढ़ी भी पर्यावरण के क्षेत्र में प्रेरणा लेती है।
जीवन के अनमोल क्षण
- जब एक घायल बाघिन को उन्होंने खुद ट्रैक किया और उसकी जान बचाई
- जब उन्होंने 15 दिन जंगल में रहकर पक्षियों का गहन अध्ययन किया
- जब उन्होंने स्थानीय गांव में स्कूल खोलकर बच्चों को प्रकृति पढ़ाई
हर घटना उनके वन्यजीवन प्रेमी मरुति चितमपल्ली के चरित्र को दर्शाती है – समर्पित, निर्भीक और प्रकृति के सच्चे सेवक।
सामाजिक दृष्टिकोण
वन्यजीवन प्रेमी मरुति चितमपल्ली मानते थे कि जंगल केवल सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं है, बल्कि समाज का दायित्व है। उन्होंने जनभागीदारी के माध्यम से जंगलों को बचाने की अनूठी पहल की। स्कूलों, कॉलेजों और ग्रामीण समुदायों में पर्यावरण जागरूकता अभियान चलाए।

























